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लोकगीत अनुभवों का निचोड़ है: सरोज देवल बीठू

जयपुर: प्रभा खेतान फाउण्डेशन द्वारा ग्रासरूट मीडिया फाउण्डेशन के सहयोग से राजस्थानी साहित्य, कला व संस्कृति से रूबरू कराने के उद्देश्य से ’आखर’ श्रृंखला में आज राजस्थानी भाषा की साहित्यकार श्रीमती सरोज देवल बीठू से उनके साहित्यिक सफरनामे पर चर्चा की गई। श्री सीमेंट द्वारा समर्थित इस कार्यक्रम को ‘आखर राजस्थान‘ के फेसबुक पेज से लाईव किया गया। कोरोना महामारी से उत्पन्न परिस्थितियों के चलते आखर का आयोजन डिजीटल प्रारूप में आयोजित किया गया।

 

लोकगीत के इतिहास पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि ’’लोकगीत का प्रचलन वैदिक काल से पूर्व का है। उदाहरण के लिए मनुष्य का जब जन्म होता है रूदान उसका संगीत है। उसी प्रकार भाषा नहीं आयी थी उससे भी पहले से गीत है, जो गीत लोक में प्रचलित है वहीं ऋगवेद में जहां औपचारिक रूप से प्रार्दभाव होते है में अपना विशिष्ट ग्रहण कर लेता है। लोकगीत में अनुभवों का निचोड़ हैं। वह पहलू अभी तक अछूता है। लोकगीत का प्रचार-प्रसार मात्र आनंद पक्ष तक ही सीमित न रहकर हर पहलु से प्रभावित भी हैं, और उन्हें प्रभावित करते है।

 

उन्होंने आगे बताया कि राजस्थान का आम जनजीवन और लोकगीत आपस में एक-दूसरे के पर्याय है। रेगिस्तान में लम्बी यात्राओं पर निकले लोग गीतों के सहारे सफर आराम से तय कर लेते है। चड़स से पानी निकालते समय बैलों के पैर रिद्म से चलते और थमते थे। परिश्रम को सरस ये लोकगीत ही बनाते थे। हमारे लोकगीत संस्कार की तरह जन्म से लेकर मृत्यु तक हमसे जुड़े रहे है। यहाँ तक बच्चे को पालने में झूला-झूलाने के लिए भी गीत बने है। विवाह संस्कार में लोकगीतों के माध्यम से मनोवैज्ञानिक बातें भी समझायी जाती है। लोकगीत रिश्तों को भी सहजते है। 

 

सरोज देवल बीठू ने विविध उदाहरण देते हुये यह भी बताया कि किस प्रकार लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों के वाहक रहे है। घर में बड़े-बजुर्गो, रिश्तेदारों से बच्चे भी सीखते है। कार्यक्रम के दौरान सरोज देवल बीठू ने ‘‘चिठूडी-मिठूडी री गौरी गाय, नवल बना ए डोरडा नी छूटै, म्हारी आंगणिये पीपल री बेल‘‘ आदि गीतों का गायन भी किया।

 

इससे पूर्व आखर सीरीज़ में प्रतिष्ठित राजस्थानी साहित्यकारों डॉ. आईदान सिंह भाटी, डॉ. अरविंद सिंह आशिया, रामस्वरूप किसान, अंबिका दत्त, कमला कमलेश और भंवर सिंह सामौर, डॉ. ज्योतिपंुज, डाॅ. शारदा कृष्ण, डाॅ. जे़बा रशीद, देवकिशन राजपुरोहित, मोहन आलोक, मधु आचार्य, जितेन्द्र निर्मोही, डाॅ मंगत बादल, दिनेश पंचाल, मनोहर सिंह राठौड़, पं. लोकनारायण शर्मा, बुलाकी शर्मा, कुंदन माली, बसंती पंवार, आनंद कौर व्यास, किशन लाल वर्मा, तेजसिंह जोधा, डाॅ. गजादान चारण के साथ चर्चा की जा चुकी हैं।

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